satyam shivam sunderam
Friday, 30 December 2011
SAWERA
जीने की आरजू मेज
जीने की आरजू में रोज पल पल मरते हे ,क्या इसीको जीना कहेते हे ? सांज और सवेरा एक जैसा ही तो दीखता है ,फीर भी ऐ पागल दील क्यों सवेरे को ही सलाम करता है ? हर सवेरे के साथ ख्वाइशे इतनी क्यों बढती है के जीससे जिन्दगी कम लगने लगती है ?
1 comment:
vikasini
30 December 2011 at 09:53
good!!
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good!!
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